जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं उनकी सोच,पसंद, कार्यशैली, आवश्यकताएं, मूड, व व्यवहार में तेजी से परिवर्तन आता जाता है। माता पिता के लिए बच्चा हमेशा छोटा ही महसूस होता है। बहुत बार ऐसा होता है की हम उन पर उतना ध्यान नहीं दे पाते या उनके बारे में इतना संवदेनशील नहीं हो पाते जितना कि होना चाहिए।आज हम कुछ इसी पर चर्चा करने वाले हैं।
बच्चों की किशोरावस्था बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता के लिए भी चुनौती भरी हो सकती है। खासकर इस डिजिटल युग में। हालांकि यदि हम कुछ छोटी छोटी दिखने वाली किंतु अति महत्वपूर्ण चीजों पर ध्यान दें तो उनकी परवरिश इतनी मुश्किल भी नहीं है
सर्वप्रथम हम उन कारणों और कारकों पर चर्चा करने वाले हैं जिनके प्रभाव में आकर किशोरों के अंदर परिवर्तन देखने को मिलता है।
हार्मोनल कारण
टीन एजर्स (किशोरों) में कुछ हार्मोंस के कारण शारीरिक बदलाव बहुत तेजी से होता है जिससे उनके व्यक्तित्व में काफी परिवर्तन भी देखने को मिलता है। उनके व्यवहार और मूड काफी तेजी से बदलते दिख सकते हैं। हालांकि इन सब स्थितियों में कुछ चीजें बहुत सकारात्मक भी होती हैं जैसे
इस उम्र में जिज्ञासाओं की प्रवृत्ति बलबती होती है।
किशोर अत्यधिक ऊर्जा से भरे होते हैं।
अनुकरणप्रिय होते हैं।
उनके अंदर रचनात्मकता कूट कूट कर भरी होती है।
इस उम्र में आदर्शवादी प्रवृत्ति ज्यादा होती है।
सूचनाओं की तीव्रता होती है।
स्वभाव बेहद प्रतिस्पर्धी होता है।
इस उम्र में सजावट बनावट और दिखावट की प्रवृत्ति अधिक होती है।
इसके अतरिक्त इस उम्र के जो नकारात्मक पक्ष हैं वे इस प्रकार से हैं।
उग्रता
असुरक्षा
प्रतिरोध
प्रतिक्रिया
असमाजीकरण
कहते हैं कि यह वह काल है जिसमे "बचपना जाता नही है और जवानी आती नहीं है।" यह वह काल होता है जहां से उसके जीवन की दिशा तय होने वाली होती है।
सामाजिक कारण
समाज में प्रतिदिन घट रही सामाजिक घटनाएं किशोरों के मन और मस्तिष्क पर बहुत असर डालती हैं। किशोर अच्छी चीजों के बजाय गलत चीजों और आदतों को शीघ्रता से अपना लेते हैं। मद्यपान, धूम्रपान, तंबाकू गांजा, गुटखा आदि ऐसी बहुत सी नशीली चीजें है जो किशोरों की मति को भंग कर रही है। समाज में प्रतिदिन आसपास घट रही मारपीट, छेड़खानी ,चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाएं किशोरों को कहीं न कहीं प्रभावित कर रही हैं।
पारिवारिक कारण
किशोरों की जीवन शैली परिवार के रहन सहन, बात व्यवहार, आचार विचार कुछ अपवादों को छोड़कर पूर्ण रूप से प्रभावित होता है। जैसे यदि किसी परिवार में माता पिता के आपसी रिश्ते बेहद खराब रहते हैं और आए दिन उनका आपस में बड़ा विवाद होता रहता है तो इसका सीधा असर छोटे बच्चों से लेकर किशोरों तक में पड़ता है। यदि परिवार में आक्रामक किस्म के या नशा करने वाले लोग ज्यादा हैं तो स्वाभाविक रूप से इसका पूरा असर बच्चों पर पड़ता है। एक प्रमुख कारण परिवार का एकल होना भी है जहां माता पिता के पास बच्चों के लिए बेहद कम समय मिल पाता है। माता पिता बच्चों को सही संसाधन उपलब्ध तो करा देते हैं किंतु समयाभाव के कारण भावनात्मक लगाव कम होने से बच्चों में कुंठा जन्म लेती है।
दूरसंचार माध्यम
दूर संचार माध्यमों की भूमिका किशोरों और किशोरियों के जीवन में सकारात्मक और नकारात्मक दोनो प्रकार के प्रभाओं की रही है। पहले स्टूडेंट्स के रूप में किशोरों के पास सिर्फ किताबों और शिक्षकों का ही सहारा था लेकिन बदलते युग में एक क्रांति सी आ गई है। अब सारी सामग्री मोबाइल और कंप्यूटर के स्क्रीन पर पलक झपकते ही उपलब्ध है। आपको टाइप भी नही करना है सिर्फ बोल दिया और सारी सामग्री आपके सामने। यह तो रहा एक पक्ष लेकिन इसका दूसरा स्याह पक्ष उस पढ़ाई वाली सामग्री से इतर बेहद खतरनाक जहां बच्चे युवा और किशोर सभी इस जाल में फंसे पड़े हैं। इंटरनेट वह माध्यम बन गया है जहां शब्द बोलते ही बुरी से बुरी चीजें स्क्रीन पर तैरने लग जाती है। फेसबुक, इंस्टाग्राम व्हाट्सएप जैसे ऐप सुविधाजनक तो हो गए किंतु इनका दुरपयोग अश्लील सामग्री को इधर से उधर भेजने में भी किया जाने लग गया। विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण किशोरों में स्वाभाविक रूप से जन्म लेने लगती है। जहां वे इंटरनेट के माध्यम से अपनी मनपसंद विषयवस्तु देख सुन सकते हैं। किशोरों में समाज में प्रचलित भौतिक संसाधनों को प्राप्त करने और उनका उपयोग करने की भी अति आतुरता रहती है। लुभावने विज्ञापनों द्वारा किशोरों को आकर्षित किया जाता है। किशोरों में जब इसकी चाह बढ़ती है और उस वस्तु की प्राप्ति घर से आसानी से नहीं हो पाती है तो वह गलत कदम उठाने को मजबूर हो जाता है। यही वह सब कारण है किशोरों के पतन का। हत्या करने के तरीके से लेकर आत्महत्या के तरीके तक यूट्यूब पर जब बताए जाते हैं तब भला समाज का भला कैसे हो सकता है?
विद्यालय की भूमिका
किशोरों को हल्की शिक्षा देना और विद्यालयों द्वारा बालकों में स्वाभाविक रुचि न उत्पन्न करके उन्हे रटकर परीक्षा पास करने और अच्छे नंबर प्राप्त करने का दबाव बनाया जाता है। यही नहीं ग्रामीण परिवेश के स्कूलों में तो बाकायदा एक साथ सामूहिक नकल भी कराई जाती है। इसका असर किशोरों में दूरगामी होता है। उनके दिमाग से पढ़ाई वाली बात निकल जाती है। वे नकल के भरोसे हो जाते हैं एवं उनकी पढ़ने के समय की ऊर्जा असामाजिक कार्यों में लगने लग जाती है।
किशोरों की समस्या का समाधान कैसे करें?
*किशोरों के मन की उलझन को समझें
बाल्यावस्था से आगे जब बच्चा किशोरावस्था में पहुंच रहा होता है तो उसके अंदर हार्मोंस का बदलाव बहुत तेजी से होता है। इन बदलाओं की वजह से उनका शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास भी नदी के वेग की तरह होता है, इस परिस्थिति में किशोरों के माता पिता का व्यवहार उनके प्रति धैर्य और सहानुभूति से भरा होना जरूरी है। क्योंकि जो कुछ बच्चो के अंदर बदलाव आ रहे हैं वह समय के हिसाब से उनके अंदर आना स्वाभाविक है। कई बार और अधिकतर मामलों में माता पिता इन बातों को नहीं समझ पाते और शीघ्र ही आक्रामक हो जाते हैं। किशोरों की इस समय की स्थिति ऐसी होती है की वे छोटे बच्चों संग खेलना नही चाहते और बड़े बच्चे उन्हें अपने ग्रुप में शामिल करना नहीं चाहते। वो करें तो क्या करे? अपने मन की बात किससे साझा करें? किशोरों में कभी कभी इन चीजों को लेकर चिड़चिड़ापन भी देखा जाता है। किसी के हर प्रश्न का जवाब उल्टा पुल्टा, बेढंग तरीके से देना भी देखा जाता है। कई बार उन्हें अकेले समय बिताना ज्यादा अच्छा लगता है। इस उम्र में बच्चे खुद को बहुत शयाना समझने लगते हैं। उन्हें लगता है कि अब वे काफी बड़े और समझदार हो गए हैं। वे कई बार बात बात में इसे बोलकर अपने बड़े हो जाने का दावा भी करते हैं और आपको एहसास भी दिलाते हैं। जानते हैं ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आप उन्हें अभी भी अपने स्तर से छोटा ही मानते आ रहे हैं क्योंकि बच्चे माता पिता की नजर में तो जैसे कभी बड़े होते ही नहीं। 20 वर्ष का युवक भी अपनी मां को 15 वर्ष का ही नजर आता है। किशोरावस्था में हो रहे परिवर्तन उनके सही मार्ग की दिशा को गलत दिशा की तरफ भी मोड़ सकते हैं। ऐसे बेहद महत्त्वपूर्ण समय में माता पिता या उनके अभिभावकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे किशोर बच्चों की मनोदशा को समझते हुए उनसे दोस्ताना व्यवहार रखें।
*खुद बोलने से ज्यादा उनकी सुने
यदि आपके अंदर यह जिज्ञासा है अथवा आप उत्सुक हैं की आपके किशोर के जीवन में क्या हलचल चल रही है तो उनसे सीधे प्रश्न करना कतई उचित नहीं होगा। बेहतर यह होगा की आप उन्हें अपना थोड़ा समय दें, उनको समझने की कोशिश करें। हो सकता है कि जो प्रश्न उनके मन में चल रहा है वह बात चीत में मुख पर आ जाय या बात करके आपको आभास हो जाय की वास्तव में चल क्या रहा है? बात करने से उनके मन की गांठें भी खुल जाएंगी और आपसे बातें साझा करके वे आप पर भरोसा भी कर पाएंगे।
*भरोसा भी दिखाएं
आमतौर पर किशोर बच्चे चाहते हैं कि घर में माता पिता और बड़े भाइयों बहनों द्वारा उन्हें गंभीरता से लिया जाय और जब ये भरोसा उन्हें नहीं मिलता तब वे खुद को उपेक्षित महसूस करने लग जाते हैं। किशोरों को लगता है कि उनकी बात को कोई गंभीरता से नहीं लेता। यहां यह जरूरी हो जाता है कि किशोरों को किसी मुद्दे पर आप अपनी सलाह देने के लिए प्रेरित करें अथवा कोई कार्य करने के लिए छोटी छोटी जिम्मेदारी दें। इससे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और आपके ऊपर भरोसा भी।
*झिड़कना मना है
किशोरों की कोई बात यदि अतार्किक लगती है तो भी उनको झिड़कना ठीक नही बल्कि अपने तर्कों से उनको सहमत करवा लेना अधिक कारगर हो सकता है। डाट देना और चुप करा देना आसान है। यह कहना कि तुम्हें कुछ नहीं पता या बेवकूफ शब्द का प्रयोग करना कदापि उचित नहीं है। यह चीजें किशोर के आत्मविश्वास को कमजोर करती हैं।
*तानाशाह बनना उचित नहीं
किशोरों पर नजर रखना पर इस तरह से की उन्हें बिलकुल भी अनुभव न हो तो ठीक है परंतु यदि उन्हें महसूस हो जाय की आप बार बार उनकी निजी जिंदगी और हर गतिविधियों की मॉनिटरिंग कर रहे हैं तो उनकी स्वाभाविकता नष्ट हो जाएगी। वे जहां भी होंगे उनके दिमाग में आपकी जबरदस्ती की उपस्थिति उनको महसूस होगी। यह एक प्रकार से उनके ऊपर ज्यादती करने जैसा है। इससे उनमें एक प्रकार का विकार ही जन्म लेगा। क्या आप चाहते हैं की आपका किशोर बच्चा वही पहने या खाए जो आपने तय किया है। बेशक हर चीज की छूट उसे नहीं दी जा सकती पर जो आप मानक बनाने जा रहे हैं यदि आप चाहते हैं की आपका किशोर उसके हिसाब से ढले या उसका काफी हद तक पालन करे तो आपको उसके सामने मजबूत और स्वीकार्य तथ्य रखना होगा जिससे आपकी बातों से वह सहमत हो सके। एक उदाहरण से समझाता हूं। मान लीजिए की आपका किशोर रोड की चीजें जैसे पानी बताशा, बर्गर, तली भुनी चीजें, चाउमीन, पिज्जा समोसा आदि fast-food खाने का अधिक शौक रखता है तो क्या इतनी आसानी से आपकी बात मान पाएगा ? नहीं ना! यहां पर उसे समझाने के लिए आपको अपना मजबूत और अकाट्य पक्ष रखना होगा। एक बात और कि किशोरों का सीमाओं का लांघना स्वाभाविक है। उनके दोस्तों पर आपकी नजर होनी चाहिए। कभी कभी उसके दोस्तों को घर बुलाने में कोई हर्ज नहीं इससे आप उनके संगत के बारे में जान पाएंगे। किशोर को भी कहीं न कहीं इस बात का डर रहेगा की मेरी कोई बदमाशी या अनुशासनहीनता दोस्तों के माध्यम से माता पिता तक पहुंच जाएगी। एक बात याद रखना जरूरी है कि प्यार के साथ साथ अनुशासन भी बहुत जरूरी है।
*संतुलित हो आपका व्यहार
जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं, उनमें कुछ बदलाव आना स्वाभाविक है। अगर आप उनके व्यवहार, मूड अचानक आवेश, उनके ऊर्जा स्तर या भूख में बदलाव देखें तो बिना आलोचना किए बात जरूर करें और उनके मददगार बने। इससे वे निडर होकर अपनी समस्याओं के बारे में आपसे चर्चा कर पाएंगे। उनसे बातचीत के समय नकारात्मक शब्दों का प्रयोग न करें। हमेशा सकारात्मक वाक्यों का प्रयोग करें। जैसे पढ़ाई के लिए कहना हो तो डांटने के बजाय उनसे यह कहना उचित होगा कि मेहनत से पढ़ाई करने से परिणाम अच्छा आएगा।
*सारांश
बच्चों की किशोरावस्था बेहद संवेदनशील होती है। इस अवधि में उनके अंदर शारीरिक और भावनात्मक बदलाव बहुत तेजी से होता है। माता पिता और अभिभावकों को उनकी इस स्थिति को गंभीरता से लेना चाहिए। किशोरों की मनोदशा को समझते हुए सही मार्गदर्शन द्वारा उन्हें सही दिशा दी जा सकती है।
आपने इस पोस्ट को गंभीरता पूर्वक पढ़ा, आपका आभार। अगर आप को ये पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया अपने अन्य शुभेक्षुओं, मित्रों में भी साझा करें।
*धन्यवाद*











Bilkul cathartic likha Hai apane sir jee
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