तनाव के कारण क्या हैं?, इससे कैसे बचें

 अक्सर हमारे जीवन में स्वास्थ्य को लेकर, संबंधों को लेकर, संपत्तियों को लेकर कई बार तनाव की स्थिति से गुजरना पड़ता है। कई बार तो बड़े विवाद तक की स्थिती उत्पन्न हो जाती है। इन परिस्थितियों में हम स्वयं को कैसे संभालें यह वर्तमान में एक अति महत्वपूर्ण चुनौती है।

आइए जानते हैं तनाव के महत्वपूर्ण कारण कौन कौन से हैं।


*तनाव के महत्त्वपूर्ण कारण*  

जीवन के इस अति व्यस्ततम समय में जब हर व्यक्ति के पास समय का अभाव है तो उसी जगह कुछ लोग बिलकुल खाली हैं। कोई काम के बोझ तले दबाव और तनाव में है तो कोई बिलकुल खाली होने के कारण दबाव और तनाव में है।आज हम चर्चा करेंगे इन्ही महत्त्वपूर्ण विषयों पर......

(1) बेरोजगारी

यह आज के समय की सबसे बड़ी समस्या है। जिन युवाओं को चहकते, महकते और ऊर्जा से भरे होना चाहिए वे युवा मलिन उदास और निस्तेज से नजर आने लगे हैं। कुछ नौकरियों के लिए हजारों युवा मैदान में टूट पड़ते हैं। रोजगार नहीं मिल पाने और पैसे का अभाव उन्हें आक्रामक बना रही है। उनके मोरल वैल्यूज शून्यता की तरफ अग्रसर हैं। तोड़फोड़, लड़ाई झगड़ा, मारपीट चोरी अथवा लूट का गुण उनके अन्दर आता जा रहा है। एक पढ़ा लिखा युवा भी जब अपने हुनर के अनुकूल जॉब नहीं पता है तो उसके अंदर फ्रस्ट्रेशन का भाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। युवाओं में तनाव का होना बेहद चिंताजनक है क्योंकि जब वे तनावपूर्ण जीवन जीते हैं तो उनकी कार्य शैली भी स्वाभाविक रूप से प्रभावित होती है। ऐसे युवाओं के लिए अहम यह है कि वे अपने शरीर, शैक्षणिक योग्यता, उनके गुण और मन के हिसाब से अपने क्षेत्र का चयन बड़ी सावधानी से करें। जरूरी नहीं कि प्रथम बार ही उन्हें कोई बड़ी नौकरी हाथ लगे, पर जो क्षेत्र उन्हें पसंद है यदि वही क्षेत्र उन्हें मिल जाता है और नौकरी भले ही छोटी हो तो उन्हे सीखने के अवसर भी आयेंगे। खाली बैठने और तुरंत से मोती तनख्वाह के चक्कर में बैठे रहने से आप का समय और ऊर्जा दोनो नष्ट होती है, ऐसे में आप फ्रस्ट्रेशन की तरफ अग्रसर होने लगते हैं। एक बात कहूंगा ध्यान से समझना और महसूस करना कि जब खूब घना कोहरा होता है और आप को लगता है की आगे बढ़ पाना मुश्किल होगा फिर भी पैदल, साइकिल, अथवा मोटरसाइकिल से जब आप आगे बढ़ते हैं तो वही रास्ता धीरे धीरे दिखता चला जाता है और आप मंजिल की तरफ अग्रसर होते रहते हैं। जीवन का भी यही फंडा है। तालाब का रुका पानी गंदा हो जाता है पर नदी का बहता पानी साफ रहता है। जीवन चलने और चलते जाने का नाम है। यदि रुके तो तालाब में रुके जल की तरह इसका भी शीघ्र दूषित होना स्वाभाविक है। युवाओं से कहूंगा कि बस एक पहल उन्हें करने की जरूरत है बाकी रस्ता खुद ब खुद मिलता चला जायेगा।



(2) एकल परिवार

 मुझे अच्छी तरह से याद है कि हमारे दादा, बाबा या पिताजी के समय में जब संयुक्त परिवार होता था तो बच्चे परिवारों में पल जाते थे, उनकी उत्तम परवरिश भी हो जाती थी और बच्चों को ये पता भी नही होता था कि उनके असली माता पिता कौन हैं। पिटाई के वक्त हम चाची ताई दादी आदि के पीछे भाग कर छुप जाया करते थे और ये घर के सदस्य हमारे लिए ढाल का काम किया करते थे। कोई घर का एक सदस्य बीमार होता था तो सारे लोग दौड़ पड़ते थे। दादाजी ही सब पर हावी रहते थे। वही एक वन मैन आर्मी होते थे। भले ही वे चलने फिरने में समर्थ नहीं होते थे किंतु उनकी डॉट में इतनी कड़क होती थी कि पिता जी की भी घिग्घी बंध जाया करती थी। पर उस डॉट के पीछे उनका अत्यंत प्यार भी छुपा रहता था। हमारी मां या पिताजी से जब हमे डाट पड़ती थी तो हमे लगता था की हमारे पास घर में सुप्रीम कोर्ट है जहां जाने पर हमारी सुनवाई होगी। परिवार एकल हो जाने से लोग अपना दुख दर्द भी बयां नहीं कर पाते। कोई बैकअप न होने से अपरिहार्य परिस्थितियों में सारा दुःख स्वयं ही उठाने को लोग मजबूर हैं। कोई चार पैसे अधिक कमाने लग गया तो उसे लगता है की उसे अब परिवार का ज्यादा बोझ उठाना पड़ेगा इसलिए वे परिवार से अलग होना बेहतर समझते हैं। उनका ये अलगाव माता पिता के कंधे को झुका देता है। परिवार से बड़ा कुछ नहीं।परिवार वाह पाठशाला है जहां से बच्चा परिपक्व होकर निकला तो फिर उसे भविष्य की परेशानियों से लड़ने का हुनर मिल जाता है। प्रयास हो की परिवार न टूटे और न ही छूटे।







(3)वैवाहिक संबंध

एक वक्त वो भी था कि अत्यंत पढ़े लिखे व्यक्ति के साथ बेहद कम पढ़ी लिखी या बिना पढ़ी लिखी महिला से विवाह हो जाने पर भी रिश्ता जन्म जन्मांतर के लिए हो जाता था। आज स्थिति ये है कि दोनो खूब पढ़े लिखे उच्च डिग्री होने के बावजूद संबंध कुछ ही दिनों में खराब होने लग जाते हैं। हमे एक दूसरे को समझने के लिए भावनाएं ही नहीं हैं। जब भावनाशून्य व्यक्ति होगा तो फिर संबंध कभी टिकाऊ नहीं हो सकते। कुछ दिन की खटपट के बाद मारपीट, तलाक, आत्महत्या या साथी की हत्या का रूप सामने आता है। प्रेम विवाह में क्या कारण है कि विवाह के पहले एक दूसरे को खूब समझते हैं, रिस्पेक्ट भी करते हैं लेकिन जब विवाह के कुछ दिन बीत जाते हैं तो वही अपना ही साथी रास नहीं आता। उसका मुख्य कारण है कि उनका आकर्षण मात्र शारीरिक होता है,भावनात्मक नही। जिस दिन लोग एक दूसरे की भावना को समझ जायेंगे उनके संबंध भी मधुर बन जाएंगे। युवाओं को चाहिए कि भले ही वे आत्म निर्णय लें किंतु यदि उन्हें जरा सा भी ये महसूस हो की उनकी होने वाली या वाले साथी के विचार, कार्यशैली, रहन सहन, खानपान अधिक भिन्न हैं और मुझे भविष्य में इन सब से समस्या हो सकती है तो भरसक प्रयत्न करें की आदर सहित उस संबंध से किनारा कर लें। विवाह व्यक्ति क्यों करता है या करती हैं? यही न कि हमारे एकाकी जीवन में कोई प्रेम का रंग भरे। सूनी जिंदगी आबाद हो जाय। हम भी अपने दुख दर्द, खुशी, प्रेम, किसी से बयां कर सकें। यदि यह सब विवाह के बाद न संभव हो पाए तो ऐसे दाम्पत्य जीवन सुख की जगह दुःख देने लग जाते हैं और सारी जिंदगी चौपट हो जाती है। युवाओं से कहूंगा कि सिर्फ तन देखकर ही नहीं मन देखकर भी वैवाहिक सूत्र में बंधे। क्योंकि मन पूरे जीवन काल तक आपके साथ रहेगा जबकि तन के सुंदर बने रहने की कोई उम्र नहीं। तन कभी भी किसी बीमारी से, ऐक्सिडेंट से या अन्य कारणों से विकृत हो सकता है। पर एक समझदार और वफादार साथी मिल गया तो जीवन सार्थक हो जायेगा।




(4) महत्वाकांक्षाएं 

इस भौतिक युग में जब सभी लोग पैसों के पीछे भाग रहे हों और सुखी रहने का एक मात्र मापदंड पैसा ही हो गया हो तो स्वाभाविक है कि बिना पैसे के कोई कैसे खुश रह पाएगा? जबकि ये पूरी तरह सही नहीं है। यह सत्य है की पैसा खुशहाल जीवन जीने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है किंतु यही एक यथार्थ सत्य होता तो बड़े बड़े अधिकारी, राजनेता, अभिनेता, कर्मचारी जिनके पास पैसों की कमी नहीं फिर भी दुखी हैं। उसका मूल कारण है इनकी महत्वाकांक्षा। जो साइकिल से चल रहा है वो मोटर साइकिल से चलना चाहता है। मोटर साइकिल वाला कार से, कार वाला पचास लाख वाली कार से और ऐसे ही। मैं ये नहीं कहता कि महत्वाकांक्षा कोई ना पाले क्योंकि इसको न पालने वाला भी काहिल की श्रेणी में आता है। महत्वाकांक्षाएं व्यक्ति के जीवन स्तर को उठाने में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं। पर..... थोड़ा रुकिए और सोचिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आगे की खुशियों और बेहतर जिंदगी जीने की चाह की खोज आपकी वर्तमान खुशी को भी तो नहीं निगल रही है? कई बार ऐसा होता है की हमारे पास किसी चीज की कमी नहीं होती फिर भी हम दुखी होते हैं खासकर उसके लिए जो हमारे पास नहीं होती। जीवन का एक एक पल रेत की तरह खिसक रहा है। अगले पल क्या होने वाला है कोई नहीं जानता। घर से निकले दरवाजे पर ही हार्ट अटैक आ गया या अगले चौराहे पर एक्सिडेंट हो गया फिर उस महत्वाकांक्षा का क्या मतलब। परिवार से बड़ा कुछ नही। दुनिया में एक से बढ़कर एक पैसे वाले लोग हैं । हम कब तक अपनी तुलना सबसे करके दिमाग खराब करते रहेंगे। महलों में रहकर भी कभी कभी वो खुशी नहीं मिलती जो कभी किसी छप्पर वाले के घर पर रहकर भी मिल जाया करती है। 


(5) अनियमित जीवन शैली

यह एक ऐसा मुद्दा है जिसको लोग गंभीरता से नहीं लेते जबकि असंतुलित जीवन शैली असंतुलित जीवन और तनाव को जन्म देने वाला होता है। एक असंतुलित जीवन, व्यक्ति को काहिल, लंपट, उदासीन, अकर्मण्य, आक्रामक, उद्दंड, व्यभिचारी और न जाने कितने रोगों का घर बना देता है। इसकी परिणति बाद में तनाव के रूप में नजर आती है। संतुलित जीवन व्यक्ति को बेहतर सोच , जिम्मेदार और उत्कृष्टता प्रदान करती है। संतुलित जीवन शैली में खानपान,आहार विहार, गुणवत्तापूर्ण शास्त्र आने वाले समय में बच्चों और युवाओं को शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से बहुत मजबूत बनाते हैं। बच्चों और युवाओं को सुबह उठने, योग, व्यायाम, ध्यान आदि की क्रिया की आदत डलवाने से इनका आगे का जीवन प्रकाशित होता है। निस्तेज मन को चेतना मिलने से ये पूर्ण रूप से बेहद ऊर्जस्वित नजर आते हैं। अतः इन बच्चों और युवाओं को संतुलित जीवन जीने के लिए प्रेरित करना हमारी प्रथम जिम्मेदारी बनती है।




सारांश

अंत में तनाव के महतवपूर्ण कारक कुछ इस प्रकार के हैं।

*गंभीर बीमारी

*शारीरिक या मानसिक चोट

*दुर्व्यवहार का अनुभव

*अपराधबोध से ग्रस्त होना

*भेदभाव महसूस करना

*किसी प्रकार का दबाव

*गरीबी

*बेरोजगारी

*कर्ज

*ब्रेकअप/ तलाक/ कोर्ट का चक्कर

*बांझपन

*एकाकीपन

*अनियमित जीवन शेली 

*महत्वाकांक्षाएं आदि

उपरोक्त के अतिरिक्त और भी अनेक अनगिनत कारक हैं जो मानसिक रूप से परेशान करते हैं और हम तनाव लेते हैं।यद्यपि तनाव से कुछ हासिल नहीं होता बल्कि शारीरिक और मानसिक समस्याएं बढ़ जाती हैं। तनाव हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक विकृत पैदा करता है इसलिए इसे अधिक समय तक अपने ऊपर हावी न होने दें। अकेले बिल्कुल ना रहें। लोगों के बीच रहें। अपने शुभचिंतकों, परिवारजनों, अग्रजों से अपनी समस्या का जिक्र करें । इससे आपका मानसिक बोझ भी हल्का होगा और समस्या के निराकरण में सहायता भी मिल सकेगी।  

मेरे प्रिय पाठकों !आगे भी जिंदगी से जुड़े तमाम अन्य पहलुओं पर हम विस्तार से चर्चा करते हुए आप सभी से मुखातिब होते रहेंगे। 

पने अपना कीमती समय हमे दिया इसके लिए आप सभी का धन्यवाद। 






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