आज के आधुनिक युग में जब हर जगह टेक्नोलॉजी का प्रयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। सबके हांथ में मोबाइल, लैपटॉप, टैबलेट पहुंच चुका है। जहां एक तरफ इसके प्रयोग से बहुत से कार्य बेहद आसान हो गए हैं वहीं दूसरी तरफ इसका अनावश्यक प्रयोग बच्चों, किशोरों और युवाओं में अनेक प्रकार की मानसिक और शारीरिक समस्याओं को जन्म दे रहा है। उन्हीं समस्याओं में एक समस्या जो बहुत तेजी से बच्चों, किशोरों और युवाओं को अपने गिरफ्त में ले रही है वह है डिजिटल डिमेंशिया। आज हम इसी पर विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।
क्या होती है डिजिटल डिमेंशिया?
डिजिटल डिमेंशिया एक प्रकार की दिमागी परेशानी है जिसमे व्यक्ति डिजिटल डिवाइस जैसे मोबाइल फोन लैपटॉप, कंप्यूटर, टैबलेट आदि पर अधिक से अधिक निर्भर हो जाता है।
वास्तव में डिजिटल डिमेंशिया में लंबे समय तक स्क्रीन पर समय गुजारने से दिमाग के कंजीनेटिव फंक्शन बुरी तरह से प्रभावित होते हैं। कोई व्यक्ति इसके अधिक प्रयोग से भुलक्कड़ प्रकृति का हो सकता है। कम उम्र में भूलने की इस समस्या को डिजिटल डिमेंशिया कहा जाता है।
अगर व्यक्ति बहुत देर तक और बहुत दिनों तक लगातार स्क्रीन पर समय बिताता है तो उसे सीधे तौर पर स्पाइन से जुड़ी समस्या भी खड़ी हो सकती है। स्पाइन से जुड़े अन्य अंग तंत्रों पर भी इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
बच्चे और स्मार्ट फोन
आज का युग ऐसा है कि हर छोटा बड़ा व्यक्ति मोबाइल स्क्रीन से चिपका नजर आता है। बच्चों और युवाओं में ऑफलाइन गेमिंग या ऑनलाइन गेमिंग के जरिए घंटों स्क्रीन पर समय बिताना जैसे महामारी का रूप लेता जा रहा है। बच्चों से लेकर 45 वर्ष तक के लोगों में यह प्रवृत्ति बहुत ही ज्यादा है। स्मार्ट फोन के पहले बच्चे tv स्क्रीन पर बैठते थे तो घर के बड़े लोग बच्चों को थोड़ी दूरी बनाकर टीवी देखने की सलाह देते थे, पर अब वही बच्चे बड़े हो गए हैं और अब उनके अपने ही बच्चे अपने चेहरे को मोबाइल स्क्रीन में घुसा कर देखना शुरू कर दिए है और हम चाह कर भी उन्हें नहीं संभाल पा रहे हैं। इस प्रकार से सबसे ज्यादा स्क्रीन का कुप्रभाव सबसे छोटे बच्चों के शरीर,आंखों और दिमाग पर पड़ रहा है जो बेहद चिंताजनक है।
कितनी खतरनाक है डिजिटल डिमेंशिया?
डॉक्टर्स बताते हैं की स्मार्ट फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट पर लगातार काम करते रहने से दिमाग के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होने लग जाती है जो बाद में डिजिटल डिमेंशिया के रूप में सामने आ सकती है। डॉक्टर्स बताते हैं कि स्क्रीन पर अधिक से अधिक समय गुजारने और नेटवर्क का अधिक प्रयोग करने से बहुत सी इमेजिंग विडियोज, ऐप्स का प्रयोग एक साथ आपके दिमाग पर अटैक करती हैं जिसमे सब कुछ याद कर पाना दिमाग के लिए संभव नहीं होता और वह नेटवर्क के जंजाल में फंसा रहता है। इस प्रकार से मस्तिष्क अपनी एकाग्रता खो देता है और बहुत सी चीजें उसे भूलने लग जाती हैं।
डिजिटल डिमेंशिया के लक्षण
भूलने की बीमारी
किसी एक चीज पर आसानी से फोकस न कर पाना
किसी चीज को याद किए हुए न रख पाना
ध्यान केंद्रित न हो पाना
परफॉर्मेंस का अभाव
अभी अभी कुछ खोज रहे थे पर क्या खोज रहे थे याद नहीं, यह प्रवृत्ति विकसित होना।
किन्हें है डिजिटल डिमेंशिया का ज्यादा खतरा?
चूंकि स्क्रीन पर समय बिताने में 3 वर्ष के बच्चे से लेकर 45 या 50 वर्ष के व्यक्ति सबसे आगे हैं तो स्वाभाविक रूप से ये खतरे भी सबसे अधिक इन्हीं में है। नन्हें बच्चों का अंग बेहद नाजुक होता है उनका बैठने या लेट कर स्क्रीन पर चिपकने से अंगों को पोस्चर आसानी से खराब हो सकता है। जबकि किशोरों और युवाओं में आलस्य का संचार तेजी से होता है। उनके अंदर चपलता का अभाव और मोटापा तेजी से जन्म ले सकता है। डिजिटल डिमेंशिया से बच्चों, किशोरों और युवाओं में किन्हीं चीजों को आसानी से हैंडल कर लेने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
सभी के लिए डिजिटल डिमेंशिया से बचने के लिए आवश्यक सुझाव
फोन का अनावश्यक प्रयोग अत्यंत सीमित करें। आवश्यकतानुसार ही प्रयोग करें।
शारीरिक गतिविधि पर अधिक जोर दें
बहुत आवश्यक ना हो तो अधिकतर एक्टिविटीज ऑफलाइन ही करने पर जोर दें।
लोगों से अधिक से अधिक मिलें जुलें
विटामिन, मिनरल्स और फाइबर युक्त आहार लें
योग प्राणायाम एक्सरसाइज को जीवन में सामिल करें
रात में मोबाइल का प्रयोग बिलकुल कम करें, इसकी जगह पर नीद को स्थान दें क्योंकि 6 से 7 घंटे की नीद स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
डिजिटल डिमेंशिया से बच्चों को कैसे बचाएं?
बच्चों को आउटडोर गेम खेलने के लिए प्रेरित करें।
स्वयं बच्चों के साथ खेलने की प्रैक्टिस करें।
खाली समय में आर्ट/ चित्रकारी जैसे उनकी पसंद का कार्य करने को कहें।
बच्चों का मोबाइल प्रयोग सीमित करने के लिए समय सेट करें। उन्हे एक डेढ़ घंटे से अधिक समय न दें।
डिजिटल पर निर्भर होने के बजाय कॉपी पर सवाल करें। लिखने की जगह कंप्यूटर पर प्रयोग न होकर कॉपी का प्रयोग हो।
खाली समय में नई नई चीजों में बच्चों को व्यस्त रखें जैसे कोई नई भाषा सीखना, डांस सीखना, संगीत सीखना, कराटे की कक्षा, आर्ट की कक्षा आदि।
चूंकि बच्चे बहुत देर तक एक ही पोजिशन में बैठे रहते हैं इस लिए उनके शरीर की एक्सरसाइज, आंखों की एक्सरसाइज पर ज्यादा ध्यान दिया जाना जरूरी है।
बच्चों के लिए स्वयं भी रोल मॉडल बने। इसका अर्थ है की बच्चों के भविष्य को सुधारने के लिए खुद को भी डिजिटल दुनिया से सीमित करें ताकि वे आपका अनुसरण कर सकें।
बच्चों के लिए बाजार से कुछ ऐसे खेल सामग्री लाएं जिसमे पजल्स हों। ऐसे खेल दिमाग के लिए बहुत अच्छे होते हैं। इसे खेलने से बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होगा। उनका कैलकुलेशन करने की क्षमता बढ़ेगी।
सारांश
यदि आप या आपके घर में बच्चे एक निश्चित अवधि से ज्यादा स्मार्ट फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप पर समय बिता रहे हैं तो आपको बिलकुल सावधान हो जाने की जरूरत है क्योंकि डिजिटल डिमेंशिया की समस्या एक दिन में नहीं खड़ी होती बल्कि यह धीरे धीरे आपको अपनी गिरफ्त में लेती है। समय रहते यदि हम इस पर ध्यान दे ले जाएं तथा अपनी जीवन शैली को बेहतर कर पाएं तो स्वयं और अपने बच्चों को इस समस्या से दूर रख सकेंगे।
आपने मेरे पोस्ट को ध्यान से पूरा पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद।
सादर आभार





Thanks for this valuable knowledge
जवाब देंहटाएं